Is sari controversial ? | Hindi

सारी
सारी का विवाद

 लेख ने यह भी दावा किया कि भारतीय फैशन उद्योग में भारत सरकार सक्रिय रूप से हस्तक्षेप कर रही है जो किसी तरह से हिंदु लोगों को लाभान्वित कर रहा है।
तो, इससे पहले कि मैं उन लोगों के बारे में बात करूं जो भारत में साड़ी से लाभान्वित होते हैं, उन देशों के नाम के बारे में जानना बहुत महत्वपूर्ण है जो स्पष्ट रूप से एक रिलीजन का पक्ष लेते हैं दूसरों की तुलना करें। PEW (पी ई डब्ल्यू) रिसर्च सेंटर द्वारा तैयार की गई एक हाल ही की रिपोर्ट से पता चला है कि विश्व स्तर पर, 80 से अधिक देश हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खास रिलीजन्स का पक्ष लेते हैं और भारत उस सूची में नहीं था। तथापि, यूरोप में कई देश आधिकारिक या अनाधिकारिक तौर पर ईसाई धर्म का पक्ष लेते हैं और इसमें कुछ प्रसिद्ध नाम भी शामिल हैं जैसे यूनाइटेड किंगडम, स्पेन, इटली, ग्रीस, डेनमार्क, फिनलैंड, नॉर्वे और आइसलैंड।
इस रिपोर्ट के अनुसार, कई देश अपने पसंदीदा रिलीजन्स को वित्तीय, कानूनी या अन्य उपयोगी लाभ देकर लाभान्वित करते हैं। इनमें से कुछ तथाकथित प्रगतिशील और आधुनिक यूरोपीय देशों के नाम जानना बहुत ही ज्ञानवर्धक है जो किसी तरह समानता, स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता का उपदेश देके वैश्विक आदर्श होने की भूमिका अदा करते हैं.... लेकिन वास्तव में अपने देश में वे जो करते हैं वह पूरी तरह से विपरीत है। क्या यह धोखेबाजी नहीं है?
रिपोर्ट यह भी प्रकट करती है कि विश्व में कोई देश नहीं है जो आधिकारिक या अनाधिकारिक तौर पर हिंदू धर्म का पक्ष लेता है। इसलिए, आदर्शरूप से पश्चिमी मुख्यधारा मीडिया का ध्यान इन यूरोपीय देशों पर केंद्रित होना चाहिए जो स्पष्ट रूप से वित्तीय, कानूनी या अन्य उपयोगी लाभ देकर एक विशेष रिलीजन का पक्ष ले रहे हैं दूसरों की तुलना में।
लेकिन अजीब है, उनका ध्यान भारत और भारतीय साड़ी पर केंद्रित है। अब आप में से कुछ को यह चौंकाने वाला लग सकता है लेकिन यह सच है। इसी रिपोर्ट ने यह भी दर्शाया है कि विश्व में कोई देश नहीं है जो हिंदू धर्म को अपना आधिकारिक सरकारी रिलीजन का नाम देता है यद्यपि यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि वैश्विक स्तर पर हिंदू धर्म का अनुसरण एक अरब से अधिक लोगों द्वारा किया जाता है।
दूसरी तरफ, विश्व में 43 ऐसे देश हैं जिनका स्पष्ट रूप से एक सरकारी रिलीजन है और ऐसे कई देश यूरोप में हैं। अपने आप से एक प्रश्न पूछें - आप कितनी बार एसे लेख पढ़ते हैं या वैश्विक मुख्यधारा मीडिया में समाचार देखते हैं जो इस बात के लिए इन यूरोपीय देशों की आलोचना करते हैं कि वे प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप से अपने पसंदीदा रिलीजन्स का पक्ष लेते हैं?
और इंटरनेट पर मेरी खोज के दौरान, मुझे पता चला कि PEW रिसर्च सेंटर की इस विशेष रिपोर्ट को शीर्ष समाचार वेबसाइटों द्वारा अधिकतर नजरअंदाज किया गया था। जहां तक साड़ी का संबंध है, यह भारत के सभी वर्गों को लाभ पहुंचाती है।
यह महिला बुनकरों को सशक्त बनाती है, यह उन को सशक्त बनाती है जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि यह भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाती है। भारत में, सभी बैकग्राउंड्स और समुदायों के लोग हैं जो इसे पहनते हैं, इसे बेचते हैं और इसका उत्पादन करते हैं।
मैं व्यक्तिगत रूप से कई अवसरों पर साड़ी पहनती हूं। मेरी शादी में, मेरी बहन और दोस्तों ने भी यही किया। कई भारतीयों के लिए, साड़ी बस जीवन का एक ढंग है चाहे उनके धार्मिक विश्वास कुछ भी हों। ऐसा क्या है कि जब भारत मंगल ग्रह पर पहुंचता है या भारतीय साड़ी पहनते हैं तो न्यू यॉर्क टाइम्स जैसों को बेचैनी महसूस होती है?
अमेरिका के मुख्यधारा मीडिया को यह विश्वास करने का कोई निहित अधिकार नहीं है कि उनके रुझान और उनकी जीवन शैली का संस्करण विश्व के बाकी हिस्सों के लिए सही और उपयुक्त जीवन शैली के रूप में स्वीकार और प्रस्तावित की जानी चाहिए। और क्या वे अन्ततः ऐसी प्रकार की मानसिकता से छुटकारा पा सकते हैं जो अमेरिकियों को विश्व के रक्षक के रूप में देखना पसंद करती है?
कुछ हद तक, इस तरह की मानसिकता की झलक उन हॉलीवुड फिल्मों में से कुछ में दिखती भी है जिनमें एक अमेरिकी नायक एक विनाशकारी स्थिति से विश्व की रक्षा कर रहा होता है और विश्व के बाकी हिस्सों के नागरिक अधिकतर मूक दर्शक या प्रशंसक बने रहते हैं। हां, यह उचित है कि सभी देश एक-दूसरे के सर्वोत्तम प्रचलनों को अपनाएं और लाभ लें एक संतुलित और एक सकारात्मक सांस्कृतिक विनिमय का लेकिन साथ ही हमें समझना आवश्यक है कि यह जरूरी नहीं कि वैश्वीकरण का अर्थ अमेरिकीकरण हो।
अगर न्यू यॉर्क टाइम्स के इस लेख के लेखक को यह मानना पसंद है कि साड़ी विशेष रूप से हिंदू है और अगर यह लेखक इसे वैश्विक लक्जरी कंपनियों के लिए एक चिंताजनक संकेत मानता भी है, तो लेखक वैश्विक कंपनियों यह सलाह क्यों नहीं देता है कि वे (बजाय) साड़ी बनाना शुरू कर दें? लेखक यह देखने के लिए ज्यादा उत्सुक क्यों है कि भारतीय साड़ी पहनना छोड़ दें? हां, पश्चिमी मीडिया में ऐसे लेखों के लिए हमेशा पर्याप्त जगह होती है। शायद वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि ऐसे समाज को धोखे से प्रभावित करना ज्यादा आसान है जहां कुछ सदस्य पहचान संकट को झेल रहे हों।
क्योंकि जिन लोगों में स्वाभिमान और आत्मविश्वास कम होता है उनकी अधिक संभावना है कि वे अपनी पहचान और विरासत को छोड़कर विदेशी संस्कृतियों, विचारधाराओं और जीवन शैली को अपना लेंगे। और अवश्य ही, सांस्कृतिक वर्चस्व के माध्यम से वैश्विक बाजारों को हथियाना एक पुरानी और समय परीक्षित रणनीति है।
क्या हम ऐसे विश्व में रहने का सपना देख सकते हैं जहां कोई भी देश या समुदाय किसी से भी श्रेष्ठ या हीन महसूस नहीं करता है? शायद, यही समय है कि पश्चिमी मीडिया अंततः अपने प्रभुत्व की मनोदृष्टि से छुटकारा पाएं इस प्रकार की खबरों की आपूर्ति को रोककर जो उनके अपने नागरिकों को किसी तरह अधिक अज्ञानी बना रही हैं या उन्हें एक कृत्रिम बुलबुले में रख रही हैं और शायद पश्चिमी मीडिया गंभीरता से अपनी स्वयं की समस्याओं का थोडा और सामना शुरू करना चाहेंगे।
दूसरी ओर, कुछ भारतीय शायद अंततः यह समझना पसंद करेंगे कि कभी-कभी उनके दुश्मनों के युद्ध जीतने का सबसे अच्छा तरीका यही होता है कि वे भारतीयों को विश्वास दिलाएं कि कोई युद्ध है ही नहीं। मैं यहां सांस्कृतिक वर्चस्व के युद्ध के बारे में बात कर रही हूं।
और इस धोखे भरे युद्ध में, क्या भारतीयों को पता भी है कि उनके दुश्मन कौन हैं?
फिर मिलेंगे!
Is sari controversial ? | Hindi Is sari controversial ? | Hindi Reviewed by Niranjan Yamgar on August 16, 2019 Rating: 5

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