दलित समाज सुवर क्यों पालते है?

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में कुछ दिन पहले मुंबई गया था, मुंबई में एक निहायत पढ़ी लिखी उत्तर प्रदेश की बहू जो डॉक्टर है, उन्होंने मुझे दलित समाज के बारे में जो बातें बताई वो में बता रहा हूं, इसे गौर से पढ़िए!

में अब बेहत महत्पूर्ण बात कहने जा रहा हूं, किसिके दिल को चोट भी पोहोंचे तो मुझे माफ़ कर देना, क्युकी मेरा इसमें कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है, में गरीब घर से हूं समाज के लिए काम करता हूं!

उन्होंने मुझे कहा, ये दलित लोग, वाल्मीकि समाज के लोग सुवर क्यों पालते है, में चाहती हूं के अब ये सुवर ना पाले, में उनकी बात को समझा नहीं!

उन्होंने मुझे बड़े विस्तार से ये बात बताई, में सोचने लगा क्या इतने बड़े बलिदान को, जब आप खुद खतरे में हो, आपका समाज खतरे में हो आप उससे समझौता करने की जगह आप उससे लड़ने का मार्ग निकलते है, ये बहुत कम होता है, ये बात अलग है, ये जो अब्दुल्ला है कश्मीर में वो मुसलमान होने का दावा तो ३०० बार करते है, लेकिन इस बार मैने उनका इतिहास निकला और ये पूछा कि अब्दुल्ला साहब 1722 में आपके जो पूर्वज थे उनका नाम क्या था? अब उन्हें पता है ये बात अलग है कि लोगों के सामने नहीं बताते!
ये अब्दुल्ला झुटा इसके पूर्वजों का नाम 1722 से अगर निकाले आप तो उनका नाम था राघव राम! अब जिन लोगों ने 2 रुपए किलो चावल और तलवार के जोर पर अपना धर्म बदल लिया, अपना नाम बदल लिया वो कीनपे अत्याचार कर रहे थे इसपर बात कर रहा हूं!

तो उन्होंने आगे बताया कि ये जो दलित समाज है आखिर ये सुवर ही क्यों पालता है? ये तो हिंदू समाज का एक बड़ा हिस्सा था, क्यों की उस वक्तमें इनकी महिलाएं बहुत खूबसूरत होती थी, कि उसका जीता जागता उदाहरण ये है कि उन्होंने कहा कि ये उस वक्त ये रिवाज था, कि जो भी बहू गाव में आएगी वो शुरू के ३ दिन तक शेख साहब के घर में रहेगी, और ये सिलसिला चलता रहा, उनसे होने वाली जो संताने होती थी आप महाराष्ट्र जाइए जो रेखा बंडवाल है उनसे मिले, आज भी वो संताने दलित शेख के नाम से जानी जाती है!  उस वक्त ये तमाम दलितों ने क्या किया, ये मुघलों से ज्यादा ताकतवर तो नहीं थे, लड़ने की क्षमता नहीं थी, हिंदू समाज के बड़े वर्ग ने उन्हें अलग थलग किया था, उन्होंने कहा हमारी बहू बेटियों को आपकी तीन दिन दुल्हन तो बनाएंगे लेकिन क्या हमें ये इजाजत है, क्या हमें ये छूट से सकते है कि हमारी जो कुलदेवता है उसकी पूजा करने के बाद हम इसको तुम्हारे सुपुर्द कर दे! तो शेख साहब ने हा कर दी!

उन्होंने क्या किया की पहले कुल देवता की पूजा की ओर ये तय किया कि इस कुल देवी की सेवा में सुवर की बलि चड़ेगी, और उसके बाद कहा गया कि हमारी जो कुलदेवता को बली चडेगी , ( हमारे सबके घर में जब बहू आती है तो आपके देखा होगा , जो घर में वो महावर रखते है थाली में उसमे वो पैर रखती है, वो वो घर में वैसे ही चली है,ये रसम हिंदू धर्म की है)उन लोगों ने कहा ये जो बली है जानवर की जो हमारे कुलदेवता ने ली है हमारी ये बहू इसके खून में अपने दोनों पैर गिले करेगी और जिसके भी घर जाएगी पहले ये ऐसे ही जाएगी! और दलित समाज ने ये सिर्फ करा नहीं, इसे करा ये जानते हुए भी, की ये खबर सबको पता चल जाए, और इसका ढिंढोरा जानभूज कर ज्यादा पीटा, और जब ये खान साहब को पता चला कि दलित लड़की के पैर पहले सुवर के खून से भरकर मेरे बिस्तर के पास आ जाएंगे तो अल्लाह मुझे वैसे भी माफ नहीं करेगा, तो पहली फुरसत में ये रसम उसी दिन से बंद हो गई!
जिनको हजारों सालों से दूसरा रास्ता था अब्दुल्ला कि तरह, उन्होंने उस रास्ते को नहीं चुना और उन्होंने हिंदू धर्म को नहीं त्यागा, वो आज भी है!

में जम्मू कश्मीर की बात करते हुए ये साबित करना चाहता हूं कि वो खून खतम नहीं हुआ है, वो सोच खतम नहीं हुई है!

में एक 1957 कि घटना बताना चाहता हूं, 1957 में उस वक्त जो शेख थे 1200 साल पहले मुझे उनका पता नहीं लेकिन ये नकली शेख, कश्मीर में जो है धर्मपरिवर्तन किया है, जो तलवार की जोर पर नई इस्लाम सलवार पहन ली है, इन्होंने क्या किया, इनको लगता था हम जितना अत्याचार करते थे उतना ही होगा, तो शेख साहब के उस सूबे ने दलितों के अंदर, वहा जो लोग सफाई का काम करते थे वो दलित नहीं थे, वहा हड़ताल हो गई महामारी फैल गई तो शेख साहब ने, अब तो शेख साहब है बाकी कुछ नहीं करते, तो आप सोचिए बक्षी गुलाम मोहोम्मद साहब जिनके आगे मोहॉम्मद लगा हुआ है उन्होंने अपने कैबिनेट के दो लोगों को भेजा की जाइए हिंदुओं में कोई जात होती है जो ये गंदगी साफ करती है उसको लेकर आयिए, उनके दो अफसर गए गुरूदस्पुर, पठानकोट, और अमृतसर ओर 200 वाल्मीकि लोगों को लेकर आ गए, और उनसे ये वादा किया गया कि आप जम्मू कश्मीर में रहिए हम आपको यहां की नागरिकता भी देंगे और हम आपको नोकरी भी देंगे, में उन तमाम लोगों से मिला हूं, इस 370 और 35a के दौर में सबको गले लगाया मैंने, आप सोचिए जरा 1957 के दौर में भारत के अंदर इंग्लिश सिस्टम भी नहीं आया था, कि उस वक्त की क्या प्रथा थी कि शेख साफ का मलमूत्र जो दिनभर वो पेट में इकठ्ठा करते थे ये दलित लोग उसे सिर पे उठाकर गाव से बाहर फेंकने जाते थे! ये 1957 कि घटना है कोई ज्यादा दूर कि नहीं!  पुरे देश में ये सर पे मैला ढोने वाली प्रथा को समाप्त कर दिया गया लेकिन जम्मू कश्मीर में भारत का संविधान नहीं चलता तो ये कानून वहा लागू नहीं किया गया, और दलित लोग मुस्लिम शेख का मैला उठाने में मजबूर रहे!

उन दलितों कि 1957 से लेकर आज 5 वी पीढ़ी आ गई है उनके बच्चे आज राष्ट्रीय न्यूज चैनल पे पत्रकार है, कोई डॉक्टर है, कोई इंजिनियर बने हुए है, कितना दबाव आर्थिक और सामाजिक रहा होगा कि वो भी पिछले 70 साल से ना तो वोट दे सकते थे ना उस जम्मू कश्मीर में उनको नोकरी मिल सकती थी, लेकिन आप सोचिए जरा, उस हिम्मत कि दाद दीजिए, मैंने वो सीन अपनी आंखो से देखे है, आप सब लोग अपने मान मन में सोच सकते है इस बात को उन दलितों लोगों को पिछले 70 साल से लगातार ये कहा गया ये कहा गया की अगर आप इस्लाम मजहब अपना लेंगे तो फिर हम आपको यहां की नागरिकता दे देंगे, सोचिए कि उनकी आज 5 वी पीढ़ी मोबाइल से खेल रही है, बड़े बड़े कॉलेज में पढ़ रहे है, बड़ी बड़ी डिग्री लेकर आए है उसके बावजूद भी आज के दौर के अब्दुल्ला और मुफ्तियों को शर्म आनी चाहिए, कि उन्होंने जो इस्लाम ने 1200 में नहीं किया वो आज के मुस्लिम ने कश्मीर में दलितों के साथ किया!

आज हमारे देश में मुझे बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है, लोगों की बड़ी बड़ी जातियां होती है लोग बड़े अपनी जाती का घमंड देते है, लेकिन मैंने तो सुना है कि लोग नोकरी दे देंगे तो क्रिश्चन हो जाते है, लोग नोकरी दे देंगे तो नाम बदल देते है तो सिर्फ आप इसलिए की आपको लगता है कि आप ही हिंदू है तो माफ कीजिए, अगर इस देश में कोई कट्टर कोई बहादुर कोई दलित है जो आज आधुनिक भारत में 2019 तक लगातार उस तकलीफ को सहते आया, उसने गंदगी ढोई उसको नोकरी नहीं मिली, उसके दादा परदादा लोगों ने गंदगी उठाई, उनके बच्चे आज भी गंदगी उठा रहे है, लेकिन हिंदू धर्म नहीं छोड़ा!

इसलिए में आपसे कहता हूं प्रकृति भी, और जिसे आप भगवान कहते है वो मौका जरूर देता है आपको ऐसा नहीं है कि मौका नहीं देता नहीं मिलता, ये तो ऊपर वाले की ताकत और आपका पुरुषार्थ और इस देश के लोगों को सही चीज सही वक्त पर याद आ गई, अन्यथा इतिहास की ये घड़ी भी वैसे ही चले जाती जैसे पटेल जी के समय चली गई थी!

लिहाजा मैंने कहीं जगह लोगों से कहा कि अगर कुछ नहीं कर सकते भाई, इस देश में एक बात याद रखके कि किसिभी तरह आप अपने परिवार में अपनी बेटी अपने बेटे को इग्नोर कर देंगे, उसको ये एहेसास करा देंगे कि तुम्हे कुछ नहीं आता तुम चुप बैठा करो, आज आप 8 साल के बच्चे से जरा कहकर तो देख लीजिए, समय बदल गया है, हम सबको बदलना है, पूरे हिंदू समाज को बदलना है, इसलिए ये जो बार बार रफीक साहब के घर सेवइयां खाने जाते है, आप इद के दिन रफीक साहब के घर जाएं या ना जाए हप्ते में एक बार दलित के घर का पानी जरूर पीकर आ जाए!

आप हो सके तो उनको नौकरियां दे दीजिए, ये तमाम सारी चीजे है लेकिन इंसान कि एक भूक होती है, उसकी नोकरी और पैसे से ज्यादा इस समाज से कुंठा है कि मुझ दलित से बाकी हिंदू क्यों नहीं गले मिलते, ये बाकी लोगों से क्यों गले मिलते है मुझमें क्या कमी है!

दलित हमेशा आपको दूर करेंगे, उनको नोकरी नहीं चाहिए, पैसा नहीं चाहिए, सिर्फ एक बार गले तो लगा लीजिए, ये २२ करोड़ लोग जो आपसे अलग हो गए है जो जय भीम और जय मीम के नाम से अलग हुए है यही आपकी ताकत है, इनको पहले गले लगा लीजिए, बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा!

आपको इसके साथ साथ, मैंने इसी लिए कहा कि 1000 साल की गुलामी के रहने के कारणों में जब आप चर्चा करेंगे, आप अकेले में करेंगे या सामूहिक करेंगे तो इमानदारी से करिएगा, किसी पार्टी, संगठन, ब्राह्मण, ठाकुर, दलित से बाहर निकाल जाइए! आपने अपने कारणों से अपने आप को कमजोर किया है, आपका दुश्मन इतना ही कमजोर था जितना आज 370 के हटने के बाद कश्मीर में है, लेकिन आपकी अपनी गलतियों ने दुश्मन को मजबूत बना दिया है, ये दो घटनाएं है जो 1200 साल पहले भी धर्म परिवर्तन करके नहीं गए आज 2019 में भी डटे रहे, कितनी बड़ी बात है वो ढाई लाख लोग तो 200 वाल्मीकि दलित समाज के वंशज जो शेख साहब का मैला उठाने आए थे उनको नागरिकता नहीं मिली थी जो आज 370 हटने के बाद जम्मू कश्मीर के नागरिक भी होंगे, उनको वही तनखा भी मिलेगी, और जो केंद्र सरकार की योजनाएं है की वहा sc/st एक्ट नहीं चलता था आज वो भी लागू होगा! तो को 84 सीटें है उनमें दलितों को भी सीटें मिलेंगी आज से!

Writer: Pushpendra Kulshrestha